ऐसा श्लोक और उसका अर्थ जिसके उच्चारण मात्र से पूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल प्राप्त होता है।

 

आप सभी भक्तों को नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं।

माता रानी की कृपा आप सब पर सदैव बनी रहे।

सभी भक्त अपनी-अपनी हाजिरी “जय माता दी” लिखकर ज़रूर दें।


आज मैं आप सभी को एक ऐसा श्लोक और उसका अर्थ बताने जा रहा हूँ,

जिसके उच्चारण मात्र से पूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल प्राप्त होता है।


श्लोक का पाठ

जय-जय गिरिवर राज किशोरी,

जय महेश मुख चन्द चकोरी।

जय गजबदन षडानन माता,

जगत जननी दामिनी दुति गाता।

नहिं तव आदि मध्य अवसाना,

अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।

भव भव विभव पराभव कारिनि,

विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।

पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख,

महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी,

बरदायनी पुरारी पिआरी।

देबि पूजि पद कमल तुम्हारे,

सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।





अर्थ का वाचन

अब जानते हैं इस श्लोक का विस्तार से अर्थ—


जय-जय गिरिवर राज किशोरी,

जय महेश मुख चन्द चकोरी।

अर्थात, हे देवी, आप पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं,

आपकी जय हो।

आप भगवान शिव के मुखरूपी चंद्रमा की चकोरी के समान हैं,

जो लगातार उनके दर्शन की अभिलाषा रखती हैं।

आपकी यह छवि भक्तों के मन में भक्ति भाव जगाती है।


जय गजबदन षडानन माता,

जगत जननी दामिनी दुति गाता।

आप भगवान गणेश, जिनका मुख हाथी के समान है,

और भगवान कार्तिकेय, जिनके छह मुख हैं—

इन दोनों की माता हैं।

आप संपूर्ण जगत की जननी हैं,

और आपके शरीर की आभा बिजली की चमक जैसी है।


नहिं तव आदि मध्य अवसाना,

अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।

आपका न कोई आदि है, न मध्य, न अंत।

आपकी महिमा अपरंपार है,

जिसे वेद भी पूरी तरह नहीं जान पाए हैं।


भव भव विभव पराभव कारिनि,

विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।

आप जन्म-मरण के चक्र में वैभव और पराभव की कारण हैं।

आप समस्त विश्व को मोहित करती हैं,

और अपनी इच्छा से विचरण करती हैं।


पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख,

महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।

सभी पतिव्रता स्त्रियों में आपकी गणना सर्वप्रथम होती है।

आपकी महिमा इतनी बड़ी है कि हजारों सरस्वती और शेषनाग भी उसका गुणगान नहीं कर सकते।


सेवत तोहि सुलभ फल चारी,

बरदायनी पुरारी पिआरी।

आपकी सेवा से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—ये चारों फल सहज ही मिल जाते हैं।

आप वरदान देने वाली हैं, भगवान शिव की आराध्य हैं।


देबि पूजि पद कमल तुम्हारे,

सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।

हे देवी, आपके चरण कमलों की पूजा करके

देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।

आपकी कृपा से सारे कष्ट दूर होते हैं

और जीवन में आनंद की प्राप्ति होती है।

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